Shikayat !!


शिकायत!!

खुद से …खुदा से…वक़्त से…हालात से…
अपनी बेचैनी से …अपनी उम्मीद से…
न जाने कब किससे…क्यों ये शिकायत ??

बस ये शिकायत है !!


क्यों ये कहते हुए ख़ामोशी से शिकायत…
क्यों ये रहते हुए ज़िन्दगी से शिकायत…
क्यों ये बहते हुए आँसू से शिकायत…
क्यों ये जाते हुए प्यार से शिकायत…
क्यों ये आते हुए गुस्से से शिकायत…
क्यों ये छोटी -छोटी मुश्किलों से शिकायत…
क्यों ये दूर रहते रिश्तों से शिकायत…

क्यों है ये शिकायत ?

बस खुद से कह दे …के कुछ नहीं पाने की है चाहत…
कुछ खोने का गम नहीं… कोई पास हो उसकी आरज़ू नहीं …
बस खुद से उम्मीद है…शिकायत भी खुद से…
ज़िन्दगी साँसों से बंधी रहे …ज़िन्दगी बस यूँहि बीत जाए !!

कहना क्या और सुनना क्या…
बस आँसू आँखों से कुछ कह दे…
दिल थोड़ा सा मुस्कुरा दे…
दूर जो है वह पास आकर कुछ सुना दे…
आरज़ू बस दिल के कोने में … सूकून से सपने में खो जाए !!

कहते है – जब बात खुद की हो तो शिकायत भी अपनी सी लगती है…
कुछ कहती नहीं है…बस खुद में सिमट के रह जाती है !!

जब तक शिकायत है … प्यार भी है और नफरत भी !!
ज़िन्दगी भी है … और उम्मीद भी !!

शिकायत है इसलिए…

आपको ज़िन्दगी मुबारक !!

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